होलिका दहन क्यों किया जाता है ? होली का महत्तव ! Holi kiyu manaya jata hai

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Holi ka Mahattav

इन दिनों लगभग बच्चे एक सप्ताह पहले से ही रंग गुलाल पानी का गुब्बारा लेकर छत पर खड़ा होकर आने-जाने बाले राहियों पर फेकना प्रारम्भ कर देते हैं। इस पर्व की प्रतीक्षा बच्चे बूढ़े युवा स्त्रियां सभी बहुत ही बेसब्री से करते हैं। ये पर्व बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। 

इस दिन नए नए पकवान बनते हैं। अच्छे अच्छे स्वादिष्ट भोजन बनते हैं इस दिन बहुत सारी मस्तियाँ होती है, बहुत  धूम मचते हैं। ये पर्व बच्चों के शरारत बिना अधूरा अधूरा सा लगता है। ये पर्व फाल्गुन मास के पूर्णिमा तिथि होलिका दहन के कल होकर मनाते हैं। ये पर्व लगभग पूरे भारत में बहुत धूम धाम से मनाते हैं।

◆होलिका दहन को लेकर पैराणिक मत?
◆होलिका दहन को लेकर वैदिक मत?
◆जब शास्त्र में स्त्री की पूजा तो फिर पूतना वध होलिका दहन ये सब क्यों?
◆होलिका दहन करने की सही विधि क्या है?
◆होली क्यों मनाते हैं?
◆होली कैसे मनाना चाहिए?
◆होली पर क्या क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

ये वार्ता यही अंतिम नही होती, असत्य का सत्य पर जीत युगों युगों से होता आया है, फिर चाहे पूतना वध हो या कंस राज की या रावण वध हो चाहे कार्तिकेय द्वारा किया ताड़कासुर वध या फिर महादेव द्वारा काम का भस्म ही क्यों न हो या पांडवो की कौरवों ओर जीत, ये सभी असत्य ओर सत्य की ही जीत है। गीता में उल्लेखित है कि

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

अर्थात-जब जब साधु संत सत्य भक्ति मार्ग पर असुर रूपी असत्य का प्रहार होगा तब तब मैं धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए अवतार लूंगा।

वैदिक मान्यता....

वेद के उल्लेख  अनुसार सनातन सम्बंधित कोई भी पर्व तिथि नक्षत्र ऋतु आगमन के अनुसार ही होता है।ऋग्वेद मतानुसार

उद्धर्षतां मघवन् वाजिनान्युद वीराणां जयतामेतु घोषः। 
पृथग् घोषा उलुलयः एतुमन्त उदीरताम्।।
 [अथर्व० .३.१९.६]

अब इस दिनों वामपंथ मार्ग में शास्त्रों की अवहेलना जोर शोर पर है।कुछ का कहना है कि शास्त्र  में उल्लेख है कि 

【यत्र नारी पुज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता】

अर्थात-जहां नारी की पूजा होती है देवता वहीं निवास करते हैं।

तो फिर पूतना वध या होलिका दहन क्यों?

असल में ये बात किसी स्त्री की हत्या का नही है अपितु असत्य का वध का है।
होलिका दहन करने का तात्पर्य यहां किसी स्त्री को बांध कर जलाने से नही है।
होलिका दहन का तात्पर्य की अपने अवगुणों को अपने अंदर विद्यमान असुर लक्षणों का परित्याग करना अपने गलत कर्मो का अपने असत्य मार्गो का अपने अंदर के अहंकारों का अपने कटु वचनों का अपने अप्रिय व्यवहारों का अपने अंदर के दुर्भावों का अग्नि रूपी सत्य में जला देना..जो कि उस समय ये अवगुण वगेरह नामक होलिका थी उसी का दहन आज भी होता है।
 यही वार्ता आसुरी पूतना के साथ भी हुई थी।और रही बात स्त्री की तो हमारा तो दूध रूपी अमृत देने बाली पशु को माता कहना सिखलाती है,आरोग्यता प्रदान करने बाली पौधा तुलसी को माता कहना सिखलाती है,जहां प्यास बुझाने बाली गंगा जमुना सरस्वती नर्मदा कावेरी जैसे नदियों को माता का पद देती है।जिस धर्म ने हमें कभी भी ऊंच नीच का भेद भाव नही सिखलाया जिस धर्म के मार्ग पर चलने बाले मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने सबरी के जूठे बेर तक खाएं अहिल्या के चरण छूकर आशीर्वाद भी लियें।

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जिस धर्म ने जन्मदात्री औरत को माँ से सम्बोधित कर जन्म जन्म तक इस बन्धन को अटूट कर दिया जिस धर्म में नव दिन तक अखंड व्रत रखकर स्त्री की पूजा करते हैं जिसे नवरात्र भी कहा जाता है भला वो धर्म किसी स्त्री की हत्या करना कैसे सिखला सकता है।ये उनकी दुर्भावना है जो ऐसा सोचते हैं।
ये वास्तविक में एक खुशी है जो असत्य पे सत्य की विजय से प्राप्त होती है।
अब है कि होली कैसे मनाएं

पौराणिक कथाओं के अनुसार यह मानना है कि हिरणकश्यप जो कि भगवान का शत्रु था, अब भला शत्रु का भजन करने वाला व्यक्ति किसी को क्यों भाए, यहां शत्रु का भजन करने वाला कोई और नही हिरणकश्यप का पुत्र भक्त प्रह्लाद ही था। माना जाता है कि प्रह्लाद भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थें, और वो हमेशा भगवान विष्णु का ही गुणगान करतें जो कि हिरणकश्यप को अच्छा नही लगता। 

इसके लिए हिरणकश्यप ने उन्हें कई प्रकारों से प्रह्लाद की हत्या करने की सोची परन्तु ये सब तो भगवान की लीला थी, भगवान भला भक्त को कहाँ कुछ होने देते  अंत में हिरणकश्यप ने प्रह्लाद को जलाने की सोचा, इसमें उसकी सहायता हिरणकश्यप की बहन होलिका करती है। जिसके पास ऐसी चादर थी कि क्षिति जल पावक गगन समीर ये पंच तत्व उन्हें विलीन नही कर सकते, अब प्रह्लाद को गोद में लेकर होलिका बैठ गयी, प्रह्लाद उस समय भी भगवान विष्णु के साधना में लीन थें, फिर हुआ कुछ यूं कि आंधी चली और वो चादर प्रह्लाद से लिपट गया और होलिका चादर विहीन हो जल कर भस्म हो गयी।और इन तरह असत्य पर सत्य का जीत मानकर लोग होलिका दहन प्रत्येक वर्ष करते हैं। 

अंतिम वेद अथर्व वेद का ये मानना है कि वर्ष का प्रारम्भ अर्थात नए सम्वत्सर का आगमन या कोई भी शुभ कार्य का प्रारंभ अग्नि रूपी हवन से करते है। सूर्य की अग्नि चक्र पुनः प्रारम्भ हो इसलिए नए साल की शुरुआत के पहले अग्नि रूपी हवन की जाती है।जो तिथि  फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को आती है।

इस दिन मटर चना गेंहू के की फसल ये सब तैयार हो जाते हैं।वेद उल्लेखित अनुसार फसल का पहला भाग हम हवन में दान करते हैं और इसके उपरांत ही इसे ग्रहण करते है।इस प्रकार से ये एक यज्ञ के समान है जो प्रत्येक वर्ष परम्परागत चलते आया है।

होलिका दहन करने की सही विधि क्या है?

इस समय समाज में एक अजीब से कुप्रथा चली हुई है कि होलिका दहन के दिन वर्ष भर का जमा कूड़ा कचरा प्लास्टिक अवशिष्ट पदार्थ इर्द गिर्द से इक्कट्ठे किये मैले-कुचले फटे-पुराने कपड़े पशुओं का जूठन बचा चारा,  सदा पुआल इन सब को इक्कठा कर जलाते है और कहते है कि बुराई जल गई। परन्तु ऐसा नही है इससे हमारे वायुमंडल पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है इससे प्रदूषण की मात्रा बढ़ जाती है। और अगर ऐसा होता यही तो इससे बुराई जली या नही इसका तो पता नही ओर आप अपने राष्ट्र अपने समाज को दूषित कर रहें है इतना जरूर स्पष्ट होता है।

आईये जानते हैं कि होलिका दहन कैसे करें?

होलिका दहन करने के लिए जिस स्थान पर ये होना है उसे प्रातः काल गया के गोबर से शुद्ध करें। तत्पश्चात समय गूलर पाकर पलाश इन सब की लड़की एवं गाय के गोबर के बने कंडे(उपले) को उस लकड़ी के ऊपर सजाकर अच्छे से सुसज्जित कर लें उसके बाद कपूर से अग्नि एवं निम्न दिए मंत्रोचार से अग्नि प्रज्वलित करें

【ॐ उद् बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहित्व्मिष्टापूर्ते सं सृजेथामयं च । अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥】 

उसके बाद धूप डालकर घी की आहुति दें जिससे पर्यावरण में प्राण वायु की मात्रा बढ़ती है।

फिर परिक्रमा लगाएं उसके बाद कर जोड़ नम्र निवेदन करें कि हे अग्नि मेरे अंदर विद्यमान अंधकार रूपी अज्ञानता को अपने अंदर धन कर ले।और मैं सदा राष्ट्र के मार्ग धर्म के नीति  पर चल भक्ति के मार्ग पर प्रशस्त हूँ ऐसा वरदान दें।

होलिका दहन के ठीक कल होने हम सभी रंग  भरे गुब्बारों से पानी के फब्बारों से धूम मचाते हैं जिसे होली का नाम दिया गया।

इस समय बाजार में कई नुकसानदेह रंग आ गयें हैं जिसमें रसायन मात्रा की अत्यधिकता से हमारे त्वचा को काफी क्षति पहुंचती है।इसिकिये सम्भव हो सके तो पलाश के फूल या गेंदे के फूल से बने रंग से ही खेले या फिर अच्छे गुणवत्ता के रंग से खेले और खूब धूम मचाएं और अपनी खुशियां सबसे साझा करें

हो सकता है कि सभी के पास आप जैसे साधन उपलब्ध न हों।किसी के पास खाने को  पुआ पकवान न हो या ये भी हो सकता है कि किसी के पास पहनने को अच्छे वस्त्र न हों,

तो आप सभी से एक निवेदन है कि इस होली यथासम्भव दुसरो से अपनी खुशियों को साझा कर अपने मानवता का पहचान दें और अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें और इस समय कोरोना के प्रकोप ई खुद को बचाएं और अपने छत से दूसरे के छत पर रंग की खुशियां फैलाएं, इस होली दुसरो के जीवन में रंग भरना सीखे, दूसरों के लिए गुलाल बनना सीखें, अपनो से प्रेम सम्बंध स्थापित करना सीखें बड़ो का आदर करना सीखें स्वयं पर विजय पाना सीखे जब जाकर मनेगी आपने वास्तविक होली तो अपने एवं दुसरो का ध्यान रखते हुए खूब होली खेलें एवं स्वस्थ्य रहें।

आप सभी को होली के इस त्योहार पर हमारे तरफ से बहुत सारी शुभकामनाएं।



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