झारखंड की संस्कृति (Jharkhand ki sanskriti) Tribal society India

Jharkhand ki sanskriti - Tribal society indian histry - in hindi

झारखंड की संस्कृति (Jharkhand ki sanskriti) Tribal society India
Jharkhand ki sanskriti

झारखंड
भारत में अपनी खनिज और वन संसाधनों के लिए एक बहुत ही प्रमुख और प्रसिद्ध राज्य है। सन् 2000 ई. में झारखंड को बिहार से अलग करके बनाया गया था। जंगल और झाड़ों से भरपूर इस क्षेत्र को झारखंड के नाम की उपाधि दी गई है।


झारखंड राज्य प्राकृतिक दृष्टि से दो मुख्य भागों में विभक्त है- छोटानागपुर और संथाल परगना। इसकी भौगोलिक स्थिति पठारी और वनस्थलीय है। यह मध्य भारत के विशाल पठार का पूर्वी भाग है। प्रकृति ने इसे भारत के अन्य प्रदेशों की अपेक्षा अलग विशेषता प्रदान की है।

झारखंड की जनजातिय (Tribal society) लोक जीवन नृत्य, गीत और संगीत से परिपूर्ण है। यह इनके प्राण तत्व हैं। यह भाग पहाड़ों और जंगलों से भरा है। पहाड़ों में अनेक सुंदर झरने और जलप्रपात है। इसका उत्तरी और पूर्वी हिस्सा कम ऊँचा है। बाकी हिस्से की ऊँचाई अधिक है।

‘पारसनाथ (Parasnath)’ पहाडी़ झारखंड में सबसे ऊँची पहाड़ी मानी जाती है। जैन धर्म से संबंधित होने के कारण यह संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। झारखंड की जलवायु और गंगा के मैदान की जलवायु में काफी फर्क है। झारखंड के भूभाग पर सभी जातियों के लोग निवास कर अपनी जीविका चलाते हैं। इसलिए यहाँ का रहन-सहन, वेश-भूषा और भाषाएं भी अलग-अलग है।
झारखंड की संस्कृति (Jharkhand ki sanskriti) Tribal society India
jharkhand Tribal society


झारखंड में बोले जाने वाली भाषाएँ :-

1. द्रविड़ भाषा परिवार :-
द्रविड़ भाषा परिवार में कुडुख एवं मालतो शामिल है। उराँव जनजाति द्वारा कुडुख भाषा बोली जाती है। मालतो को सौरिया, पहाड़िया तथा माल पहाड़िया जनजातियाँ बोलीती है।

2. मुंडारी या आग्नेय भाषा परिवार :-
मुंडारी भाषा परिवार में हो, खड़िया, संथाली, भूमिज, बिरजिया, असुरी, कोरबा आदि भाषाएँ शामिल है। इसका प्रयोग राँची, हजारीबाग और सिंहभूम क्षेत्रों में होता है। संथाल जनजाति के लोग संथाली भाषा में बात करते हैं।

3. इंडो आर्यन भाषा परिवार :-
इंडो आर्यन भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएँ नागपुरी, पंचपरगनिया, खोरठा एवं कुरमाली हैं। नागपुरी संपर्क भाषा होने के कारण पूरे झारखंड में प्रचलित है। यह नागवंशी राजाओं की राजकीय भाषा थी। पंचपरगनिया तमाड़, बुण्डू, राहे और सोनाहातू आदि क्षेत्रों में प्रचलित है। खोरठा भाषा जो मगधी प्राकृत से विकसित भाषा है, वह हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, संथाल परगना क्षेत्रों में बोली जाती है। कुरमाली राँची, हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, सिंहभूम, संथाल परगना क्षेत्रों में प्रचलित भाषा है।

इन भाषाओं के अतिरिक्त झारखंड में मैथिली मगही अंगिका बांग्ला उड़िया अधिक भाषाएँ भी बोली जाती है।

झारखंड का साहित्य :-

झारखंड के क्षेत्रीय साहित्य के अंतर्गत जनजातीय भाषा के साहित्य पर्याप्त व समृद्धि रूप में मिलता है। संथाली, मुण्डारी, हो, खड़िया व सादानी भाषा के साहित्य वृहत पैमाने पर लिखे गए हैं। आदिवासी साहित्य लोककथाओं, पहेलियों एवं लोकोंक्तियों से भरा हुआ है। संथालों का साहित्य काफी समृद्ध है। जिसमें सृष्टि से लेकर बाघ, गीदड़ आदि तक सभी तरह की कहानियाँ है। इन कहानियों में विभिन्न ऐतिहासिक संघर्षो और मनुष्य के विस्थापना की सूचना मिलती है।

झारखंड के लोकगीत एवं नृत्य :-

झारखंड की जनजातियाँ नृत्य-संगीत में निपुण होती है। जनजातियों के लोकगीत उनके जीवन पद्धति और संस्कृतिक धारा में प्रतिबिंब होता है। लोकगीतों में सुख-दुख और खुशी-निराशा की झलक मिलती है। जनानी झूमर, अँगनाई, बियाह, झंझाईन आदि स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला लोकगीत है। संथाल जनजाति में मुख्यतः बहा, सोहराई, डाहार, भिनसारी आदि लोकगीत प्रचलित है। हो, मुंडा एवं उराँव द्वारा जदूर, करमा, जतरा, जपी, लहसुआ लोकगीत गाया जाता है।

हर लोकगीत का अपना अलग राग होता है। झूमर गीत झूमर राग में गाया जाता है, जो क्षेत्रों और स्थानीय विशेषताओं के कारण अपना स्वरूप बदलते हैं। इस राग के अनेक प्रकार करमा, सोहराई और अन्य त्योहारों में समूह नृत्य के साथ गाया जाता है। छोटानागपुर के पश्चिमी भागों में अँगनाई राग और पूर्वी छोटानागपुर में डईड़घरा राग प्रचलित है। झंझइन राग संतान के जन्म या जन्म संबंधी संस्कारों के अवसर पर स्त्रियों द्वारा गाया जाता है।
फागुन में शिकार के गीत गाए जाते हैं उसे जपी कहा जाता है। 
हैरो लोकगीत धान की बुआई के समय गाया जाता है।

Jharkhand's dance

झारखंड के नृत्य

झारखंड में नृत्य की कई खास शैलियाँ प्रचलित है। पर्व-त्यौहार, मेला एवं घरेलू समारोह में नृत्य सबको आकर्षण में बांध लेती है। झारखंड का छऊ नृत्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान प्राप्त कर चुका है। इस ओजपूर्ण नृत्य का जन्म झारखंड के सरायकेला-खरसावाँ में हुआ है। छऊ उड़ीसा के मयूरभंज और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले का मुख्य लोक नृत्य है।

इस नृत्य में पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं के मंचन के लिए पात्र तरह-तरह के मुखोटे धारण करते हैं। इसमें प्रकृति और मनुष्य के बीच संबंधों के अतिरिक्त अच्छे और बुरे लोगों के बीच में संघर्ष से जुड़ी गाथाओं का आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य वीर रस पर आधारित होता है। छाऊ नृत्य की दो शैलियां एक सरायकेला शैली दूसरा मानभूम शैली।

झारखंड की संस्कृति (Jharkhand ki sanskriti) Tribal society India
Musical instrument

झारखंड के कुछ प्रमुख वाद्य यंत्र :-

1.मांदर
2.भेईर
3.जयपुरिया मांदर
4.बाँसुरी एवं तिरियाँ

झारखंड के पर्व :-

1. करमा (Karma) :- झारखंड के आदिवासियों का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार भादो महीने में शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पूरे झारखंड में इसे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। करमा में प्रकृति की पूजा की जाती है। करमा एवं धरमा नामक दो भाइयों की कथा पर आधारित इस त्यौहार में करम डाल की पूजा की जाती है। 

इसमें पूरे 24 घंटे तक का उपवास रखा जाता है। इस त्यौहार में अखड़ा में करम वृक्ष की एक डाल गाड़ कर उस की पूजा की जाती और रात भर सामूहिक नृत्य किया जाता है।

2. सरहुल (Sarhul) :- सरहुल आदिवासियों का एक प्रमुख त्योहार है। इसे फूलों का त्यौहार भी कहा जाता है। जिस समय पेड़ पौधे में नए कोपलें निकलते हैं, उसी के बाद सरहुल मनाया जाता है। मान्यता यह है कि प्रकृति के पूजा के बिना इन फूलों को नहीं तोड़ा जाए। 

आदिवासी जनजातियाँ प्राकृतिक पूजक होती है। सरहुल के अवसर पर घरों में नई मिट्टी लाकर घरों की लिपाई पुताई की जाती है। दीवारों पर तरह-तरह के चित्र बनाए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से घोड़ा, हाथी, मछली, फूल आदि का चित्र बनाया जाता है। सरहुल में पाहन पूजा संपन्न करता है। सरना स्थल पर गांव के सभी स्त्री-पुरुष एक साथ नृत्य करते हैं।

3. टुसू (Tusu) :- टुसू पर्व झारखंड में बड़े उत्साह से मनाया जाता है या टुसू नामक कन्या की स्मृति में मनाया जाता है। झारखंड में प्रचलित कीवंदती के अनुसार कुंवारी लड़कियाँ भगवान कृष्ण जैसा वर पाने के लिए टुसू पर्व मनाती हैं। इस दिन तिल का विशेष पीठा बनाया जाता है। 

लड़कीयाँ और रात भर जागती है। कागज एवं बाँस की खपचियों से मंदिर नुमा चौटल बनाकर उसमें टुसू की स्थापना की जाती है। बाद में इसका विसर्जन नदी या तालाब में किया जाता है। विसर्जन स्थल पर मेला भी लगता है।

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