जनजातिय समाज और सामाजिक परिवर्तन- Tribal Society Indian History

Janjati Samaj - Tribal Society Indian History - In hindi



जनजातिय समाज और सामाजिक परिवर्तन- Tribal Society Indian History-Janjati Samaj - Tribal Society Indian History - In hindi
पहाड़ी जनजाति

आज हमारे समाज में विभिन्न जाति धर्म के लोग रहते हैं। वे अपनी अपनी परंपराओं के अनुसार जीवन का निर्वाह करते हैं। वर्तमान जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला वैदिक काल में रखी गई थी। तब से आज तक इस सामाजिक व्यवस्था में काफी परिवर्तन हुए।

इस व्यवस्था के नियमों को कई राजाओं ने स्वीकार किया। विभिन्न राजाओं के हस्तक्षेप के कारण जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था मध्यकाल में अधिक दृढ़ हो चुकी थी, परंतु उपमहाद्वीप के कई क्षेत्रों में इस व्यवस्था के नियमों को नहीं मानने वाले लोग भी मौजूद थे। ऐसे लोग अपने बनाए नियमों के आधार पर सामाजिक जीवन व्यतीत करते थे।

इस समाज में अमीर-गरीब उच्च नीच बहू वर्गीय संकल्पना का अभाव था इतिहासकारों ने जनजातीय समाज के नाम से पुकारते हैं। प्रश्न है कि जनजाति किसे कहते हैं?

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आदिमानव

जनजाति : Janjati

जंगलों एवं सुदूर पहाड़ी इलाकों में बसे छोटे-छोटे गांव में एक से अधिक पीढ़ी से साथ में रहने वाले परिवार को जनजाति परिवार कहा जाता है। ऐसे अधिकांश परिवार एक दूसरे से सामूहिक और परिवारिक संबंध रखते हैं। इनकी आजीविका प्रमुख रूप से आखेट, खाद्य संग्रहण, कृषि एवं पशुपालन है।

सामान्यता: स्त्रियां कृषि संबंधी अधिकांश कार्य स्वयं संपन्न करती है। बच्चे प्राय: घरों में सूखते अनाजों को पशु पक्षियों से सुरक्षा करना जैसे छोटे-छोटे कार्य करते हैं। पुरुष पशुओं के चारे के लिए चारागाह की खोज में रहते हैं। बर्तन बनाना, झोपड़ी बनाना, टोकरी बनाना जैसे कुछ कार्य स्त्री एवं पुरुष दोनों मिलकर करते हैं। जनजातीय लोग मनोरंजन के लिए गायन, नृत्य एवं झोपड़ियों को सजाने का काम करते हैं।

जनजातियों की अपनी एक समृद्ध संस्कृति व परंपरा है। इसमें उनकी भाषा, संगीत, कहानियां एवं चित्रकारी कला शामिल है। आइए इस कसौटी को ध्यान में रखकर पता लगाते हैं कि मध्यकाल में जनजातीय समुदाय इस उपमहाद्वीप में कहां रहते थे।

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झारखंड के जनजाति

मध्यकाल में जनजातिय समाज : Janjati Samaj History

मध्यकाल में इस उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में जनजातीय समाज के लोग रहते थे। उनमें सामाजिक भेदभाव का सर्वथा अभाव था। उनकी जीवनशैलीयाँ प्रागैतिहासिक काल के स्त्री-पुरुषों की जीवनशैलीयों से समानता रखती थी।

जनजातीय समाज के बारे में समकालीन इतिहासकार एवं यात्रियों ने बहुत कम जानकारियाँ दी है। इसके कई कारण हो सकते हैं। प्रथम, जनजातीय समाज कोई दस्तावेज नहीं रखते थे। वे अपनी परंपरा एवं रीति-रिवाजों को मौखिक रूप से कथाओं कहानियों आदि के रूप में सहेज कर रखते थे। पीढ़ी दर पीढ़ी इसका स्थानांतरण मौखिक ही हुआ करता था। द्वितीय, वे बाहरी लोगों को अपने आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश की अनुमति प्रायः नहीं देते थे। तृतीय, ये समुदाय प्रायः सुदूरवर्ती इलाकों जैसे घने जंगलों, पहाड़ों, मरूभूमियों आदि में रहते थे।
जहाँ इनसे बाहरी लोगों का संपर्क नहीं हो पाता था। आज के इतिहासकार इनका इतिहास लिखने के लिए उन वार्षिक परंपराओं का इस्तेमाल करते हैं। प्रत्येक जनजाति के सदस्य नातेदारी के बंधन से जुड़े होते थे। अपने जीविकोपार्जन के लिए हुए विभिन्न प्रकार के कार्य करते थे। जहाँ कुछ जनजातियां शिकार, खाद्य संग्रहण एवं पशु पालन पर निर्भर थी, तो वहीं कुछ स्थानांतरित खेती से जुड़ी थी।

जनजातीय समुदाय अपनी परंपरा एवं रीति-रिवाजों का कोई दस्तावेज क्यों नहीं रखा करते थे?

कुछ जनजातियाँ व्यवस्थित खेती भी करते थे। प्राकृतिक संसाधनों पर उनका एकाधिकार था। जल, जंगल, जमीन से जुड़े यह समाज संयुक्त रूप से इन प्राकृतिक संसाधनों पर अपना नियंत्रण रखते थे। इन संसाधनों का बंटवारा परिवारों के सदस्य के बीच होता था। यह बंटवारा उनके अपने ही नियमों के अनुसार होता था।

कभी-कभी उनका बाहरी लोगों से टकराव भी होता था। इनके लिए बाहरी लोग वे लोग थे जो जातीय व्यवस्था को मानते थे, लेकिन इस टकराव से यह अपनी स्वतंत्रता एवं संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने में कामयाब रहे। जनजातीय समुदाय एवं दूसरे समाज के लोग एक दूसरे पर निर्भर भी रहे हैं। टकराव और निर्भरता के इस संबंध से इन दोनों समाजों में धीरे-धीरे बदलाव आया।

जनजातीय समुदाय के लोगों का बाहरी लोगों से टकराव क्यों होता था?

कुछ क्षेत्रों में कुछ जनजातियाँ शक्तिशाली एवं प्रभावशाली थी। उनका बड़े इलाकों पर नियंत्रण था। 13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान पंजाब में खोखर जनजाति का प्रभाव था। बाद में यहाँ गक्खर लोग शक्तिशाली हुए। इस जनजाति के मुखिया कमाल खान गक्खर को बादशाह अकबर ने मनसबदार बनाया था।
मुल्तान एवं सिंध में लंगाह एवं अरघुन, उत्तर-पश्चिम में बलोच, पश्चिमी हिमालय में गड्डी-गड़ेरियों तथा उत्तर पूर्वी भाग में नागा, अहोम एवं कई दूसरे जनजातियों का प्रभाव था।

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भारतीय जनजातियों के प्रमुख क्षेत्र

12वीं सदी तक वर्तमान बिहार एवं झारखंड के कई इलाकों में चेरों का शासन स्थापित हो चुका था। अकबर के प्रसिद्ध सेनापति मानसिंह ने 1991 ई. में चेर राजा भगवत राय पर आक्रमण किया था, लेकिन पूरी तरह से उसे अधीनस्थ नहीं कर पाया। हालांकि इस क्षेत्र से वह काफी धन लूटने में सफल रहा। इस क्षेत्र की अन्य महत्वपूर्ण जनजातियाँ मुंडा, संथाल, एवं असुर थी जो बंगाल एवं उड़ीसा (वर्तमान में ओडिशा) में रहती थी।

कोली, बेराद तथा दूसरी जनजातियां कर्नाटक महाराष्ट्र एवं गुजरात में रहती थी। वही कोराग वेतर, मारवार दक्षिण भारत की जनजातियाँ थी। भीलों का फैलाव पश्चिमी और मध्य भारत में था। 16वीं सदी के उत्तरार्ध में जिनमें से कई कुलों की पहचान खेतीहार किसान और जमींदार के रूप में हो चुकी थी। फिर भी भीलों से कई कुल शिकारी एवं संग्रहक बने रहे। वर्तमान छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश में गोंड जनजातियों की बहुलता थी।






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