मध्यकाल में भारतीय व्यापारी और व्यापार, मसूलीपट्टनम (Masulipatnam)

Indian traders and trade in ancient times - Masulipatnam

मध्यकाल में भारतीय व्यापारी और व्यापार, मसूलीपट्टनम-Indian traders and trade in ancient times - Masulipatnam
19वी सदी का बाज़ार

प्राचीन काल से ही भारतीय, विशेषकर दक्षिण भारतीय व्यापारी (Indian traders) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हिस्सा लेते थे। मध्यकाल में भी यह सिलसिला जारी रहा। इसमें प्रायः समुद्र के रास्ते व्यापार हो रहा था। जिसमें मसूलीपट्टनम एवं सूरत जैसे बंदरगाहों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। कालांतर में यह नगर के रूप में विकसित हुए। इन्हें पतन नगर कहा जाने लगा।

कुछ शहर बड़े व्यापारिक शहरों के रूप में विकसित हुए। पश्चिम बंगाल में भागीरथी नदी के तट पर मुर्शिदाबाद (Mursidabad) रेशमी वस्त्रों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा था, जो 1704 ई. में बंगाल की राजधानी बनी। बंगाल का कासिम बाजार सूती वस्त्र का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक शहर था।

बड़े और छोटे व्यापारी : Big traders and small traders 

व्यापारिक कई प्रकार के हुआ करते थे। उनमें कुछ बड़े व्यापारी को छोटे व्यापारी एवं बंजारे थे। छोटे व्यापारी सीमित क्षेत्रों में वस्तुओं की खरीद बिक्री करते थे, जबकि बड़े व्यापारियों का व्यापार विस्तृत क्षेत्रों में फैला था।

कुछ बड़े व्यापारियों के पास बड़े जहाज भी थे, जिससे उनके समुद्रिक व्यापार में मदद मिलती थी। कुछ व्यापारी अपने हितों की सुरक्षा के लिए संघ बनाते थे। यह संघ सामूहिक व्यापार में रुचि रखते थे। उस समय दक्षिण भारत में 'मनीग्रामम` और 'नानादेशी` ऐसे दो प्रसिद्ध संघ थे।

यह व्यापार संघ प्रायद्वीप के भीतर, दक्षिण पूर्व एशिया तथा चीन आदि के साथ दूर-दूर तक व्यापार करते थे। इसके अलावा मारवाड़ी, ओसवाल तथा चेट्टियार जैसे व्यापारी समुदाय भी थे। गुजराती व्यापारियों में हिंदू बनिया और मुस्लिम बोहरा दोनों समुदाय शामिल थे। उनका व्यापार लाल सागर के बंदरगाहों व फारस की खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका दक्षिण पूर्व एशिया तथा चीन तक फैला था।

वे अफ्रीका से सोना और हाथी दांत मानते थे। वे दक्षिण - पूर्व एशिया और चीन से मसाले, टिन, मिट्टी के नीले बर्तन और चांदी खरीदते थे। बदले में वे इन क्षेत्रों में कपड़े और मसाले बेचते थे।

नगरों में शिल्प : Nagar shilpa

बीदर वर्तमान कर्नाटक राज्य का एक शहर है। मध्यकाल में यह शिल्पकारिता के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ के शिल्पकार तांबे तथा चांदी में जड़ाई के काम में काफी कुशल थे। इन्हीं के नाम पर इस शिल्प का नाम ही 'बीदरी' पड़ गया।

पांचाल अर्थात विश्वकर्मा समुदाय में सुनार, कसेरे, लोहार, राजमिस्त्री और बढ़ई शामिल थे। मंदिरों, राजमहलों, बड़े-बड़े भवनों, तालाबों और जलाशयों आदि के निर्माण में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। इसी प्रकार के कैक्कोलार बुनकर समुदाय था, जो वस्त्र निर्माण का कार्य करता था। मध्यकाल में ये समुदाय काफी समृद्ध हुए।

मसूलीपट्टनम इन मैप


मध्यकाल में भारतीय व्यापारी और व्यापार, मसूलीपट्टनम-Indian traders and trade in ancient times - Masulipatnam
19वी सदी की भारत मानचित्र

मसूलीपट्टनम कहाँ स्थित है ?

मसूलीपट्टनम : Masulipatnam

आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के डेल्टा पर स्थित मसूलीपट्टन को मछलीपट्टनम के नाम से भी जाना जाता है। 17वीं शताब्दी में यह नगर विभिन्न प्रकार की गतिविधियों का केंद्र था। ब्रिटिश, डच और फ्रांसीसी कंपनियों का अधिकांश व्यापार इसी बंदरगाह से होता था।

मसूलीपट्टनम का इतिहास

हॉलैंड और इंग्लैंड की व्यापारिक कंपनियों ने आंध्र तट के सबसे महत्वपूर्ण पत्तन मसूलीपट्टनम (Masulipatnam) पर नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयास किया। हॉलैंडवासियों ने यहां एक किला का निर्माण करवाया था, जिसे मसूलीपट्टनम का किला कहा जाता है।

मसूलीपट्टनम बंदरगाह

ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर गोलकुंडा के कुतुबशाही शासकों ने कपड़ों, मसालों और अन्य चीजों की बिक्री पर शाही अधिकार लागू कर दिया। इसके तहत कपड़े एवं मसाले की खरीद-बिक्री पर शासक का अधिकार स्थापित हो गया। शहर को घनी आबादी और समृद्धिशाली बनाने में गोलकुंडा के कुलीन वर्गों, तेलुगू, कोमटी, चेट्टियार और यूरोपियों व्यापारियों तथा फारसी सौदागरों का अहम योगदान था।

बाद में गोलकुंडा पर मुगलों का प्रभाव बढ़ने लगा। मुगल सूबेदार मीर जुमला ने व्यापारिक हितों को लेकर हॉलैंड एवं इंग्लैंड की कंपनियों को आपस में लड़वा दिया। मीर जुमला खुद एक व्यापारी था सन् 1686-87 ई. में मुगल शासक औरंगजेब ने गोलकुंडा पर अधिकार जमा लिया।

अब यूरोपीय कंपनियों को ऐसे नए जगहों की आवश्यकता महसूस हुई जो व्यापारिक केंद्र के साथ राजनीतिक एवं प्रशासनिक महत्व के हों। इस उद्देश्य के लिए यूरोपीय कंपनीयाँ मुंबई कोलकाता और मद्रास चली गई।

इन कंपनियों के मसूलीपट्टनम से जाने के बाद इस शहर के व्यापार में कमी आने लगी। 18वीं शताब्दी के दौरान उसका पतन हो गया आज या एक छोटे से जीर्ण-शीर्ण शहर से अधिक कुछ नहीं है।

मध्यकाल में भारतीय व्यापारी और व्यापार, मसूलीपट्टनम-Indian traders and trade in ancient times - Masulipatnam
चीनी व्यापारी

रेशम मार्ग क्या है ?

रेशम मार्ग : Resham marg

रेशम मार्ग का नाम चीन के रेशम के नाम पर पड़ा जिसका व्यापार इस मार्ग से होता था। यह मार्ग प्राचीन और मध्यकाल में ऐतिहासिक व्यापारिक-संस्कृतिक मार्गों का एक समूह था। जिसके माध्यम से एशिया, यूरोप और अफ्रीका जुड़े हुए थे।

रेशम मार्ग का इतिहास

इस मार्ग का चीन, भारत, मिस्र, ईरान, अरब और प्राचीन रोम की सभ्यताओं पर काफी असर पड़ा। व्यापार के अलावा ज्ञान, धर्म, संस्कृति, भाषाएं, विचारधाराएं भी फैली। भारत का व्यापार भी इस मार्ग से होता था। भारत मसाले, हाथी दांत, कपड़े, काली मिर्च और कीमती पत्थर चीन को भेजता था।

चीन से रेशम, चाय और चीनी मिट्टी के बर्तन भारत लाए जाते थे। रोम से सोना-चांदी, शीशे की वस्तुएँ, शराब, कालीन और गहने आते थे। रेशम मार्ग का जमीनी हिस्सा 6500 किलोमीटर था।



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