पाल वंश | Pal-in-vansh-hindi-Pala-dynasty-Gopal-gurjar-pratihar

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पाल वंश : Pal vansh

पाल वंश पूर्वी उत्तर भारत में एक बेहद शक्तिशाली राजवंश था। इसकी स्थापना गोपाल पाल ने की थी।पाल वंश का संस्थापक (पाल वंश के सर्वप्रथम राजा) गोपाल पाल था।

पाल वंश साम्राज्य को मध्यकाल भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य माना गया है। "पाल राजवंश" को पाल "क्षत्रिय राजवंश" तथा "गुप्त राजवंश" भी कहा गया है।

पाल राजवंश का विस्तार (पाल वंश इतिहास) वर्तमान बिहार और बंगाल तक था। धर्मपाल के पुत्र देवपाल ने पाल वंश का विस्तार असम, उड़ीसा व नेपाल के कुछ क्षेत्रों तक किया।

इस साम्राज्य में वास्तुकला को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। वास्तुकला का उनके संस्कृति में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


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पाल राजवंश के राजा हिंदू थे परंतु वह बौद्ध धर्म को भी मानते थे। पाल राजवंश के शासक बौद्ध धर्म का बहुत आदर करते थे।

भले ही पाल राजवंश के राजाओं ने बौद्ध धर्म का बहुत आदर और संरक्षण किया हो परंतु वह हिंदू धर्म के भी बहुत कट्टरवादी थे। उन्होंने हिंदू धर्म को आगे बढ़ाने के लिए कई शिव मंदिरो का निर्माण किया। और शिक्षा पर भी बल देते हुए कई विश्वविद्यालयों का निर्माण कराया।


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यह भी जाने :-

विक्रमशिला विश्वविद्यालय (आधुनिक भागलपुर में स्थित) प्राचीन भारत में बौद्ध शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था। धर्मपाल (783-820) ने नालंदा विश्वविद्यालय के शैक्षणिक स्तर में गिरावट के बाद इसकी स्थापना की थी।

बख्तियार खिलजी ने 1203 ई. में इस विश्वविद्यालय को ध्वस्त किया। वर्तमान में प्रत्येक वर्ष फरवरी महीने में विक्रमशिला महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

पाल राजवंश की जनता राजाओं का बहुत आदर व सम्मान करते थे। पाल वंश की शासन व्यवस्था भी बहुत मजबूत थी। पाल वंश के शासकों ने लगभग 400 वर्षों तक शासन किया था।


पाल राजवंश के शासकों के नाम :-

  1. गोपाल पाल
  2. धर्मपाल
  3. देवपाल
  4. शूरपाल
  5. विग्रह पाल
  6. नारायण पाल
  7. राज्योपाल
  8. गोपाल पाल 2
  9. विग्रह पाल 2
  10. महिपाल
  11. नयपाल
  12. विग्रह पाल 3
  13. महिपाल
  14. शूरपाल 2
  15. रामपाल
  16. कुमार पाल
  17. गोपाल पाल 3
  18. मदन पाल
  19. गोविंद पाल



महत्वपूर्ण बातें :-

  ➤  पाल वंश का संस्थापक गोपाल पाल था।
  ➤ पाल वंश का प्रथम शासक गोपाल पाल था।
  पाल वंश का अंतिम शासक गोविंद पाल था।
  पाल वंश का सबसे महान शासक धर्मपाल था।
  पाल वंश की स्थापना 725 ई. में हुई थी।


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गुर्जर - प्रतिहार :-

पालों के अतिरिक्त उतर भारत की दूसरी महत्वपूर्ण शक्ति गुर्जर प्रतिहारों की थी। इस साम्राज्य का संस्थापक हरिचंद्र था। गुर्जर - प्रतिहारों ने पश्चिम व मध्य भारत तक अपनी भौगोलिक सीमा का विस्तार कर एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया।

राष्ट्रकूट बार-बार प्रतिहारों व पाल शासकों से कन्नौज और पश्चिमी गंगा के मैदानी क्षेत्रों पर अधिकार के लिए संघर्ष करते थे। कन्नौज व्यापारिक दृष्टिकोण से उत्तर भारत का एक महत्वपूर्ण शहर था।

इतिहास में इसे महोदय नगर कहकर भी पुकारा गया है। राष्ट्रकूटों ने दक्षिण के चोल राजवंश के शासकों से भी संघर्ष किया। और अपनी सत्ता को बनाये रखा।
  

राष्ट्रकूट :-


राष्ट्रकूट चालुक्यों के सामंत थे, परंतु उनकी कमजोरी का लाभ उठाकर उन्होंने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। दंतिदुर्ग ने राष्ट्रकूट वंश की स्थापना की। उसने मान्यखेत को अपनी राजधानी बनाई। उसने महाराजधिराज, परमेश्वर, भट्टारक जैसी उपाधियाँ धारण की।

कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा और एलीफेंटा की गुफाओं का निर्माण राष्ट्रकुटों ने हीं करवाया था। अमोघवर्ष, कृष्ण प्रथम, ध्रुव और गोविंद तृतीय राष्ट्रकूट वंश के राजा थे।


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सामंत कौन थे ?

राजा बड़े जमींदार व कुछ प्रमुख सैन्य प्रमुखों को कुछ राजनीतिक अधिकार भी प्रदान कर देते थे। उन्हें सामंत कहा जाता था। ये सामंत राजा को शासन चलाने में मदद करते थे।

यह जनता से कर वसूलते थे। इनके पास छोटी सेना भी होती थी जिससे वे राजा को युद्ध के समय सैन्य सहायता प्रदान करते थे।

सामंतो द्वारा वसूले गए कर से वे अपनी सेना व जागीर का संचालन करते थे। अधिक सत्ता और संपदा हासिल करने पर सामंत अपने को ही महासामंत, महामंडलेश्वर घोषित कर लेते थे।



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