प्राचीन समय में महल एवं इमारतों को कैसे बनाया जाता था ?

Ancient time construction techniques india in Hindi



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Prachin kal me mahal ka nirman

आज हजारों सालों बाद भी प्राचीन भारत के महल वह इमारत में मौजूद हैं। सालों पहले बिना कोई तकनीकों के बावजूद इतनी अच्छी और टिकाऊ दार इमारत कैसे बना लेते थे ?
उस समय तो सीमेंट का भी प्रयोग नहीं होता था। परंतु फिर भी पुराने जमाने की इमारत आज के बने इमारतों से ज्यादा मजबूत हुआ करते थे।

बिना कोई टेक्नोलॉजी के भी ऐसी सुंदर और भव्य इमारतों का निर्माण कैसे हुआ होगा। देश में ऐसी कई ऐतिहासिक इमारत है जो अपनी कलात्मक संरचना की दृष्टि से अनोखे हैं। 

यह इमारतें हमारी ऐतिहासिक धरोहर है। इन्हें किसी ने भी बनवाया हो, इसका संरक्षण करना हम सब का कर्तव्य है।

भारतीय स्थापत्य कला की गौरवशाली परंपरा लगभग 5000 वर्षों से चली आ रही है। इसमें मंदिर, गुरुद्वारा, किले, महल, हवेली, मकबरा इत्यादि प्रमुख हैं। 

राजाओं ने दो तरह की इमारतों का निर्माण करवाया। धार्मिक इमारतों व गैर धार्मिक इमारतें। धार्मिक इमारते मंदिर, मस्जिद, मकबरा इत्यादि और गैर धार्मिक इमारतों में किला, महल, हवेली इत्यादि शामिल है।

इन्हें गैर धार्मिक इमारत इस वजह से कहते हैं, क्योंकि इनका संबंध किसी धर्म से नहीं होता है। इन स्मारकों द्वारा हमें प्रौद्योगिकी, कौशल एवं तकनीक का ज्ञान होता है।

सातवीं और दसवीं शताब्दी के बीच वास्तुकला का अनुप्रस्थ टोडा निर्माण पद्धति को अपनाया गया। इस पद्धति के तहत बनाए गए भवनों में ज्यादा कमरे दरवाजे एवं खिड़कियाँ बनाई जाने लगी थी।


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Kailashnath Mandir


राजपूत कालीन स्थापत्य कला :- Rajput kalin sthapatya kala

राजपूत शासकों के शासनकाल में स्थापत्य एवं मूर्तिकला अपने चरमोत्कर्ष पर थी। राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम द्वारा महाराष्ट्र के एलोरा में निर्मित कैलाश मंदिर आठवीं शताब्दी के भव्य मंदिरों में से एक है।

इस मंदिर का निर्माण एक ही पत्थर को तराश कर किया गया है। मंदिर में घुसने का एक बड़ा रास्ता है, जिसे गोपुरम कहते हैं। दो गुंबदों के बीच एक नंदी बैल की आकृति है। एक हॉल और केंद्र में एक अभयारण्य में भगवान शिव की एक मूर्ति है।

राष्ट्रकूटों द्वारा निर्मित दक्कन की एलिफेंटा की गुफा भी विश्व प्रसिद्ध है। इसमें सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता भगवान महेश को तीनों रूपों में दिखाया गया है। इस मंदिर के निर्माण में ओडिशा, गुजरात, राजस्थान और बुंदेलखंड की शैलियों का सहारा लिया गया है।


सल्तनतकालीन स्थापत्य कला :- Saltnat kalin sthapatya kala

सल्तनत काल में स्थापत्य कला के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई। इस काल में स्थापत्य कला के क्षेत्र में एक नई शैली का विकास हुआ। यह भारतीय तथा इस्लामी शैलियों का सम्मिश्रण था।

इसलिए स्थापत्य कला के इस शैली को "ईण्डो इस्लामिक शैली" (indo-islamic-seili) कहा जाता है। दिल्ली सुल्तानों, प्रांतीय शासकों, अमीरों तथा अन्य संपन्न एवं कुलीनवर्गीय लोगों ने विशाल एवं सुंदर इमारते महल मीनार दुर्ग एवं मस्जिदे बनवाएँ।


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Vijay stambh


विजय स्तंभ :- Vijay stambh

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) का विजय स्तंभ काफी कलात्मक है इसे मेवाड़ नरेश राणा कुंभ ने बनवाया था।


सल्तनत कालीन स्थापत्य कला की विशेषताएँ। :-

  • 1.सल्तनतकालीन में निर्मित किला, मकबरा, महल, मस्जिद एवं मीनारों में नुकीले मेहराब गुंबदों तथा संकरी एवं ऊंची मीनारों का प्रयोग हुआ है।
  • 2. भारतीय एवं ईरानी शैली का प्रयोग निर्माण कार्य में किया गया।
  • 3. सल्तनत काल में सुल्तानों, अमीरों एवं सूफी संतो के स्मरणों में मकबरों के निर्माण की शुरुआत हुई।
  • 4. इमारतों की मजबूती के लिए पत्थर कंक्रीट एवं अच्छे किस्म के चूने का प्रयोग किया गया।
  • 5. सल्तनत काल में पहली बार इमारतों में वैज्ञानिक ढंग से मेहराब एवं गुंबद का प्रयोग किया गया।
  • 6. गुंबद और मेहराब के निर्माण में शिक्षा एवं शहतीर दोनों प्राणी का प्रयोग किया गया।


मुगल काल की स्थापत्य कला :- Mughal kal ki sthapatya kala

मुगलकालीन स्थापत्य कला मध्य एशिया की इस्लामी और भारतीय कला का मिश्रित रूप है। जिसमें फारस, मध्य एशिया तुर्की गुजरात बंगाल एवं जौनपुर आदि स्थानों का परंपराओं का अद्भुत मिश्रण मिलता है। 


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Lal kila (लाल किला)

शाहजहाँ ने दिल्ली में लाल किला का निर्माण कराया था यह लगभग 9 वर्षों में तैयार हुआ। किले की प्राचीर को लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित किया गया है इसलिए से लाल किला कहा जाता है। इसमें ''दीवान - ए - आम'', ''दीवान - ए - खास'' और रंगमहल प्रमुख भवन थे। मुगलों द्वारा निर्मित यह अंतिम किला था।




मुगलकालीन स्थापत्य कला की विशेषता :-

  • 1. मुगल काल में आकार एवं डिजाइन की विविधता का प्रयोग किया गया।
  • 2. निर्माण सामग्री में पत्थर के अलावा पलस्तर एवं गचकारी का प्रयोग।
  • 3. पित्रादूरा का प्रयोग - सजावट के क्षेत्र में संगमरमर पर जवाहरात से की गई सजावट।
  • 4. इस काल में बनने वाले गुंबदों एवं बुर्जों को कलशों से सजाया गया।
  • 5. बागों को गुंबदों के आसपास विकसित किया गया।
  • 6. सफेद संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग।

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