चोल वंश शासनकाल | chola dynasty | chola vansh | chola empire

  • Chola Dynasty - Chola Vansh - Chola Empire - Chol Vansh Sasankal in Hindi


Chola Dynasty - Chola Vansh - Chola Empire - Chol Vansh Sasankal
चोल वंश शासनकाल

चोल वंश : Chola vansh in hindi


दक्षिण भारतीय राज्यों में चोलों का राज्य सबसे प्राचीन था। चोल वंश का संस्थापक विजयालय (Vijayalaya chola) था। उसने पल्लवों की राजनीतिक दुर्बलता का लाभ उठाकर तंजौर पर अधिकार कर लिया तथा स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

एक युद्ध में परांतक प्रथम को राष्ट्रकूट राजा कृष्ण द्वितीय से हार का सामना करना पड़ा था। हार के बावजूद उसने हिम्मत नहीं छोड़ी और अपने राज्य को शक्तिशाली बनाने में लग गया। इसने पाण्ड्य राज्य पर विजय हासिल की। 

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राजा विजयालय

चोल वंश (chola vansh) के राजाओं में राजराज प्रथम को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। वह एक महान विजेता एवं साम्राज्य निर्माता था। उसने गंगवंशीे शासकों और केरल के राजा को पराजित किया तथा पाण्ड्यों से मदुरा छीन लिया। 

राजराज प्रथम ने समुद्र के महत्व को समझा था। अतः वह सामुद्रिक विजय के लिए निकल पड़ा और लंका के उत्तरी भाग एवं मालद्वीप नामक द्वीपों पर अधिकार कर लिया।




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Chol vansh map

इसका लाभ यह हुआ कि पश्चिमी व्यापार से प्राप्त होने वाले धन चोल साम्राज्य में आने लगा और चोल साम्राज्य (chola dynasty) आर्थिक रूप से मजबूत होने लगा। हालाँकि राजराज बहुत अधिक समय तक इन क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण नहीं रख सका। इसके अतिरिक्त वह कुशल प्रशासक, कला एवं विद्या का संरक्षक तथा उदार एवं सहिष्णु राजा भी था।

राजराज प्रथम का पुत्र राजेंद्र प्रथम चोल वंश (chola dynasty) का दूसरा प्रतापी शासक था। उसने अपने पिता की विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए एक सुदृढ़ थल एवं जलसेना के आधार पर साम्राज्य का विस्तार किया।

उसके काल में चोलों की शक्ति में काफी वृद्धि हुई। उसने चालुक्य, पाण्ड्य, चेर तथा पाल शासक को हराया। अपने शासन के पांचवे वर्ष में उसने संपूर्ण श्री लंका पर विजय प्राप्त की। राजेंद्र के पश्चात चोल साम्राज्य (chola dynasty) का धीरे-धीरे पतन शुरू हो गया।


चोल प्रशासक : Chola dynasty

चोलों ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना के साथ-साथ इसके प्रशासन की भी समुचित व्यवस्था की थी। केंद्रीय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी राजा होता था। उसके अधिकार असीम थे।

युवराज को प्रशासन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। राजा मंत्रियों एवं अनेक पदाधिकारियों की सहायता से शासन करता था।

प्रशास की सुविधा के लिए विशाल चोल साम्राज्य छह प्रांतों में विभाजित था। जिसे मण्डलम कहा जाता था। महत्वपूर्ण प्रांतों का प्रशासन राजघराने से संबंधित व्यक्ति को दिया जाता था। चोल साम्राज्य की प्रशासनिक इकाइयां अवरोही क्रम में इस प्रकार थी।

राज्य - मण्डलम - नाडु - कुर्रम (कोट्टम)

स्थानीय स्वशासन :

चोलों की स्थानीय स्वशासन की प्रणाली अनूठी थी। अन्य किसी भी भारतीय राज्य में ऐसी व्यवस्था देखने को नहीं मिलती है। चोल शासकों की स्थानीय प्रशासन व्यवस्था को वारियम कहा जाता था। यह व्यवस्था सीमित प्रणाली पर आधारित थी। चोल अभिलेखों में तीन प्रकार के ग्राम सभाओं का उल्लेख मिलता है।   ये हैं - "उर, सभा व वानगरम"

Chola Dynasty - Chola Vansh - Chola Empire - Chol Vansh Sasankalउर गाँववालों की एक ग्राम परिषद होती थी। सभा या महासभा गाँव के वरिष्ठ ब्राह्मणों (अग्रहार) की सभा थी। चोल अभिलेखों में नगरम का उल्लेख प्राय: व्यापारिक केंद्रों के प्रबंध कार्य के लिए हुआ है। नगरम की प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्य रूप से व्यापारियों को ही शामिल किया जाता था।

प्रत्येक गाँवों में ग्राम सभा की सहायता के लिए मध्यस्थ नामक कुछ वेतनभोगी कर्मचारी होते थे। केंद्रीय अधिकारियों को सहायता प्रदान करना, कर वसूलना, अपराधियों को दंडित करना, शिक्षा, मंदिर और सिंचाई की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी ग्राम सभा को थी।

चोल राज्य (chola dynasty) को भूमि और व्यापार कर से राजस्व प्राप्त होता था। इस कर का एक भाग राजा के लिए रख दिया जाता था। दूसरे भाग को सार्वजनिक निर्माण कार्य जैसे सड़क और तालाब बनाने, राज्य कर्मचारियों को वेतन देने, स्थल सेना और जल सेना का खर्च वहन करने तथा मंदिरों के निर्माण में खर्च किया जाता था।

चोलों की स्थायी सेना में पैदल, गजारोही, अश्वारोही आदि सैनिक शामिल होते थे। चोल काल में सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाले को नायक तथा सेनाध्यक्ष को महादंडनायक कहा जाता था।

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Sanskrit Tamrapatra

यह भी जानें - चोलों में ब्राह्मण एवं बल्लाल (शुद्ध वर्ग के बड़े भू-स्वामी) का सर्वोच्च स्थान था। इसके अतिरिक्त कुछ विशेष अधिकार प्राप्त वर्गों में वलंगै (दक्षिण भुजा) तथा ईडंगई (वाम भुजा) थे। दक्षिण भुजा जातियाँ मुख्यतः कृषक एवं श्रमिक जातियाँ थी तथा वाम भुजा वर्गीय जातियाँ हस्तशिल्पकारों या दस्तकारों की थी। दास प्रथा का भी प्रचलन था।

 
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Gangaikonda cholapuram temple


कलात्मक विकास :

चोल शासकों ने अपने शासनकाल में द्रविड़ स्थापत्य कला शैली को बढ़ावा दिया। इस काल में द्रविड़ शैली के अंतर्गत अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया। चोल मंदिरों (Chola dynasty temples) में विस्तृत प्रांगण विशाल विमान तथा ऊँचे एवं अलंकृत गोपुरम देखने को मिलते हैं। 

राजराज ने राजराजेश्वर या वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण तंजौर में करवाया। यह मंदिर करीब 192 फीट ऊँचा है। यह द्रविड़ शैली का विशिष्ट उदाहरण है। इस काल में मूर्ति कला एवं चित्रकला का भी विकास हुआ। 

इस युग की मूर्तिकला का सबसे अच्छा नमूना काँसे की बनी नटराज की मूर्तियाँ है। भित्तिचित्र कला के अंतर्गत वृहदेश्वर मंदिर की दीवारों पर अजंता की चित्रकला से प्रभावित धार्मिक चित्रकारी की गई है।



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काँसे की बनी नटराज की मूर्तियाँ


चोल वंश से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें :

• चोल साम्राज्य का विस्तार आधुनिक कावेरी नदी घाटी, कोरोमंडल, त्रिचिनापाली और तंजौर तक था।
• इस राज्य की कोई स्थायी राजधानी नहीं थी।
• यह क्षेत्र अपने राजा की शक्ति के अनुसार उतार-चढ़ाव करता था।
• वर्तमान पंचायती राजनीति चोल का परिणाम है।
• चोल काल के दौरान सोने के सिक्कों को काशु कहा जाता था।
• चोल की भाषा संस्कृत और तमिल थी।


निष्कर्ष :

इसमें कोई संदेह नहीं है कि चोल साम्राज्य दक्षिण भारत में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि चोल काल दक्षिण भारत का 'स्वर्ण युग' था।

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