अमीर खुसरो एक महान कवि | Amir Khusro a great poet biography

Amir Khusro The great Poet..

Ameer Khusro ,अमीर खुसरो
अमीर खुसरो


अमीर खुसरो :

अमीर खुसरो मध्यकाल के एक महान विद्वान एवं कवि थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के पटियाली (ऐटा) नामक गांँव में 1253 ई. में हुआ था। सुल्तान बलबन के समय वे शासन के संपर्क में आए। उन्होंने आठ सुल्तानों का शासन देखा। 

वह प्रथम भारतीय लेखक थे, जिसने अपने लेखन में हिंदी के शब्दो और मुहावरों का पर्याप्त प्रयोग किया। वे मूलतः इतिहासकार नहीं थे, परंतु उनके द्वारा रचित मसनवी और दीवान तत्कालीन भारतीय इतिहास के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराते हैं। उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की। वे प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। 

खुसरो पहले व्यक्ति थे, जिसने हिंदी, हिंदवी और फारसी भाषा में एक साथ लिखा। उन्हें खड़ी बोली के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है। संगीत के क्षेत्र में उन्होंने कई रागों को जन्म दिया। खुसरो ने भारत के विषय में फारसी में लिखा - गर फिरदौस बर रुये जमी अस्त। हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त (अर्थात - अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।)


खुसरो ने भी अपना पूरा जीवन राजकाज में बिताया। उन्होंने अपनी आँखों से गुलाम, खिलजी और तुगलक के उत्थान और पतन को देखा - तीन अफगान राजवंश और 11 सुल्तान। हैरानी की बात है कि अदालत में लगातार रहते हुए भी, खुसरो ने कभी भी राजनीतिक साजिशों में हिस्सा नहीं लिया जो अनिवार्य रूप से प्रत्येक उत्तराधिकार के समय थे। ख़ुसरो ने खुद को हमेशा राजनीतिक कलंक से अलग रखने के लिए एक कवि, कलाकार, संगीतकार और सैनिक बने रहे। ख़ुसरो की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि शरणार्थी की हत्या वारिस ने की जिसकी कृपा और सम्मान से उसे वही सम्मान और सम्मान मिला।


साहित्य के अलावा, संगीत के क्षेत्र में भी खुसरो का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने भारतीय और ईरानी रागों का एक सुंदर मिश्रण बनाया और एक नई राग शैली इमान, ज़िल्फ़, सजगारी आदि को जन्म दिया। भारतीय गायन में कव्वाली और सितार इनका उपहार माना जाता है। उन्होंने फ़ारसी और गीत की तर्ज पर अरबी ग़ज़ल के शब्दों को मिलाकर कई पहेलियां और दोहे लिखे

तबकात :

सामान्य इतिहास से संबंधित ग्रंथ को तबकात कहा जाता है, जिसमें विभिन्न वर्गों के बारे में इतिहास की जानकारी दी जाती है।
मध्यकाल में कागज सस्ता एवं आसानी से उपलब्ध हो गया था। अतः इसका उपयोग धर्मग्रंथ, ऐतिहासिक पुस्तकों, यात्रियों के वृतांत, अदालती दस्तावेजों, संतों के उपदेश आदि के लिखने में होने लगा था। छापाखाना नहीं होने के कारण लेखन-कार्य पांडुलिपियों में तैयार किया जाता था। इतिहासकार इन पांडुलिपियों व दस्तावेजों से विभिन्न जानकारी प्राप्त करते है, लेकिन इसका इस्तेमाल करना आसान नहीं है। 

जहाँ दस्तावेजों और पांडुलिपियों को संग्रहित कर रखा जाता है उसे अभिलेखागार कहते हैं।


छापेखाने के अभाव में पांडुलिपियों की प्रतिकृति लिपिक या नकलनवीस हाथ से बनाते थे। ऐसा करते समय लिपिक कुछ शब्दों अथवा वाक्य में फेर-बदल कर देते थे। इन प्रतिलिपियों की भी प्रतिलिपियाँ बनाई जाती थी। जिस कारण एक मूल ग्रंथ की कई प्रतिलिपियों में काफी अंतर आ जाता था। इसलिए इतिहासकारों को मूल लेखक की बातों को समझने के लिए विभिन्न प्रतिलिपियों का अध्ययन करना जरूरी होता है।

इतिहासकार :

अलग-अलग समय में लिखे गए वृत्तांतो में भी अंतर देखने को मिलता है। 14वीं सदी के इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने 1356 ई. और 1358 ई. में दो वृतांत लिखें। दोनों में अंतर है। 1971 ई. तक बरनी के पहले वृतांत के बारे में इतिहासकार को जानकारी नहीं थी। यह किसी पुस्तकालय में दबा पढ़ा था, जो बाद में मिला।

मध्यकाल के इतिहास की जानकारी अलबेरुनी, हसन निजामी, मलिक इसामी मिनहाज-उस-सिराज जैसे इतिहासकारों की पुस्तकोें से मिलती है। इसमें अलबेरुनी की तहकीक-ए-हिंद, सिराज की तबाकत-ए- नासिरी व हसन निजामी की ताज-उल-मासिर

अलबेरूनी :

इतिहासकार अलबेरुनी को खगोल, भूगोल दर्शन सहित कई विद्याओं में महारत हासिल थी। उसकी पुस्तक तहकीक-ए-हिंद मध्यकाल की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है। मध्य एशिया में जन्मे अलबेरुनी ने कई वर्षों तक भारत में रहकर भारतीय साहित्य का अध्ययन किया। 

उसे पुराणों का अध्यन करने वाला प्रथम मुसलमान माना जाता है। अपनी पुस्तक में उसने कई बार भगवद् गीता, विष्णु पुराण व वायु पुराण को उद्धत किया है। उसने उस समय भारतीय समाज में प्रचलित धार्मिक रति-रिवाज, पूजा-पाठ, दान, तीर्थयात्रा और यज्ञों का भी वर्णन किया है।


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